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Friday, 24 November 2017

हारे भी बहुत थे

गर हौसला होता तो किनारे भी बहुत थे
तुफान मे तिनके के सहारे भी बहुत थे

 ये बात अलग है कि तबज्जो न दी हमने
दिल खींचने के नजारे भी बहुत थे

कहने को हम जश्ने बहारो मे थे शामिल
महफ़िल मे मगर दर्द के मारे भी बहुत थे

हम साथ-साथ थे तो रास्ता भी था और मंजिल भी
उस वक्त तो हम जान से प्यारे भी बहुत थे

जीती हुई बाजी पे न इतराओ कि अक्सर
तुम इससे पहले इसी खेल में हारे भी बहुत थे
©®@शकुंतला
फैजाबाद

धूल के इस नगर में

किसे पता है धूल के इस नगर में
कहां मृत्यु वरमाला लिए खड़ी है
किसे ज्ञात है प्राणों की लौ छुपाए
चिता में छुपी कौन सी फुलझड़ी है
इसी से यहां पर हर राज जिंदगी  का
न छुप रहा है ना खुल पा रहा है
पूजा के बिना आरती का यह दीपक
न बुझ पा रहा है ना जल पा रहा है
©®@शकुंतला
फैजाबाद

अनुरोध

मेरा मन बहुत विचलित हो उठता है जब भी मैं कटे हुए पेड़ो को देखती हूं लगता है जैसे मेरा अंग किसी ने काट दिया हो बहुत ही असहनीय पीढ़ा होती हैं....