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Friday, 16 March 2018

सभी के लिए

दीप जैसे जले रोशनी के लिए
भाव जैसे मुखर जिंदगी के लिए

पी के स्वयं मैं अंधकार तुझे हमसफ़र
दे रही हूं दुआ उजाले के लिए

हर क़दम पर यहां लोग ही लोग हैं
खोज हैं जारी क्यों इंसान के लिए

फ़लक से प्यार में हकीक़त कहा
हर नज़र उठी सिर्फ चाँदनी के लिए

यह सिर्फ तुम्हरा हो गया है हृदय
जी रही हुँ पर मैं सभी के लिए
©®@शकुंतला
फैज़ाबाद

19 comments:

  1. वाह बहुत खूबसूरत।

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  2. वाह !!! बहुत खूब

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    1. जी शुक्रिया नीतू जी

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  3. आपकी लिखी रचना आज के "पांच लिंकों का आनन्द में" रविवार 18 मार्च 2018 को साझा की गई है......... http://halchalwith5links.blogspot.in/ पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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    1. शुक्रिया दी आपको मेरी रचना पसन्द आई
      बहुत आभार मुझे पाँच लिंको का आनंद में शामिल किया

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  4. बहुत सुन्दर रचना...
    वाह!!!

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    1. बहुत आभार सुधा जी

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  5. वाह ...
    बहुत ख़ूबसूरत शेर हैं ग़ज़ल के ... नायाब सोच को अंजाम देते हुए ...

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    1. बहुत बहुत आभार🌻🌻🌻🌻

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  6. Replies
    1. बहुत आभार रश्मि जी

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  7. प्रिय शकू -- बहुत प्यारी रचना है -- सस्नेह --

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    1. शुक्रिया my dear रेणु दी

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  8. उम्दा रचना आपके मन और हृदय की तरह ही विस्तृत .

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    1. सस्नेह शुक्रिया🌹🌺🌹🌺

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अनुरोध

मेरा मन बहुत विचलित हो उठता है जब भी मैं कटे हुए पेड़ो को देखती हूं लगता है जैसे मेरा अंग किसी ने काट दिया हो बहुत ही असहनीय पीढ़ा होती हैं....