दीप जैसे जले रोशनी के लिए
भाव जैसे मुखर जिंदगी के लिए
पी के स्वयं मैं अंधकार तुझे हमसफ़र
दे रही हूं दुआ उजाले के लिए
हर क़दम पर यहां लोग ही लोग हैं
खोज हैं जारी क्यों इंसान के लिए
फ़लक से प्यार में हकीक़त कहा
हर नज़र उठी सिर्फ चाँदनी के लिए
यह सिर्फ तुम्हरा हो गया है हृदय
जी रही हुँ पर मैं सभी के लिए
©®@शकुंतला
फैज़ाबाद
वाह बहुत खूबसूरत।
ReplyDeleteजी बहुत आभार
Deleteवाह !!! बहुत खूब
ReplyDeleteजी शुक्रिया नीतू जी
Deleteआपकी लिखी रचना आज के "पांच लिंकों का आनन्द में" रविवार 18 मार्च 2018 को साझा की गई है......... http://halchalwith5links.blogspot.in/ पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!
ReplyDeleteशुक्रिया दी आपको मेरी रचना पसन्द आई
Deleteबहुत आभार मुझे पाँच लिंको का आनंद में शामिल किया
बहुत सुन्दर रचना...
ReplyDeleteवाह!!!
बहुत आभार सुधा जी
Deleteवाह ...
ReplyDeleteबहुत ख़ूबसूरत शेर हैं ग़ज़ल के ... नायाब सोच को अंजाम देते हुए ...
बहुत बहुत आभार🌻🌻🌻🌻
Deleteबढ़िया
ReplyDeleteबहुत आभार रश्मि जी
Deleteप्रिय शकू -- बहुत प्यारी रचना है -- सस्नेह --
ReplyDeleteशुक्रिया my dear रेणु दी
Deleteबहुत उम्दा
ReplyDeleteजी शुक्रिया
Deleteउम्दा रचना आपके मन और हृदय की तरह ही विस्तृत .
ReplyDeleteसस्नेह शुक्रिया🌹🌺🌹🌺
Delete🌹शुक्रिया
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