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Thursday, 16 November 2017

आ न सकें

जब खुशी मिली तो मुस्कुरा न सकें
ग़म मिलें तो आँसुू बहा न सकें

कोशिश तो बहुत की हाले दिल बताने की
बस दो लफ्ज़ ही जुबां पर हम ला न सके

सोचा चुप रह कर भी हम सबकुुुछ उन्हें समझा देगें
पर खामोशियों की जुबां वो समझ न सकें

नज़रें मिलाई तो वो रुठ गए
फिर नज़रें झुका कर उन्हें मना न सके

रुसवा वो हुए या हम पता नहीं
हम उनके वो हमारे सामने फिर आ न सके
©®@शकुंतला
फैज़ाबाद

अनुरोध

मेरा मन बहुत विचलित हो उठता है जब भी मैं कटे हुए पेड़ो को देखती हूं लगता है जैसे मेरा अंग किसी ने काट दिया हो बहुत ही असहनीय पीढ़ा होती हैं....