एक बार
बस
एक बार
रोक लेना था मुझे....
तुमने एक बार
आवाज़ तो दी होती
मैं न रुकती
तो
इसमें मेरी खता होती
मेरे कदम
रुक रुक के
पड़ रहे थे
बस
एक आवाज़ दे कर
रोक लेना था मुझे....
लगा कर
सीने से मुझे
बस इतना कह देते
मैं हूं न......
मैं सबकुछ छोड़कर
तुम्हारी हर
खता भूलकर
एक नई शुरुआत करती मैं
पर
जब मैंने मुड़कर देखा
तुम तो जा चुके थे
मैं इंतजार करती रह गई
रोक लेना था मुझे...
यह सुनने के लिए
मैं हूं न....
शकुंतला
अयोध्या फैज़ाबाद