ये शाम जब भी आती हैं
तेरी यादों का
सैलाब उमड़ जाता हैं
और हम तेरी यादों के
समुंदर में डूबते
ही चले जाते हैं
तेरा इंतजार करते करते
कब भोर की
पहली किरण
मुझ पर पड़ी पता ही नहीं चला
तुम आओगे हमे है यकीन
इसी आशा में जी रही हूं मैं
मेरा मन बहुत विचलित हो उठता है जब भी मैं कटे हुए पेड़ो को देखती हूं लगता है जैसे मेरा अंग किसी ने काट दिया हो बहुत ही असहनीय पीढ़ा होती हैं....