ये शाम जब भी आती हैं
तेरी यादों का
सैलाब उमड़ जाता हैं
और हम तेरी यादों के
समुंदर में डूबते
ही चले जाते हैं
तेरा इंतजार करते करते
कब भोर की
पहली किरण
मुझ पर पड़ी पता ही नहीं चला
तुम आओगे हमे है यकीन
इसी आशा में जी रही हूं मैं
माँ की साड़ी माँ की साड़ी को जब भी हाथों में उठाती हूँ, ऐसा लगता है जैसे तुम अभी यहीं कहीं हो, माँ... उसमें आज भी तुम्हारी ममता...