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Friday, 16 March 2018

सभी के लिए

दीप जैसे जले रोशनी के लिए
भाव जैसे मुखर जिंदगी के लिए

पी के स्वयं मैं अंधकार तुझे हमसफ़र
दे रही हूं दुआ उजाले के लिए

हर क़दम पर यहां लोग ही लोग हैं
खोज हैं जारी क्यों इंसान के लिए

फ़लक से प्यार में हकीक़त कहा
हर नज़र उठी सिर्फ चाँदनी के लिए

यह सिर्फ तुम्हरा हो गया है हृदय
जी रही हुँ पर मैं सभी के लिए
©®@शकुंतला
फैज़ाबाद

अनुरोध

मेरा मन बहुत विचलित हो उठता है जब भी मैं कटे हुए पेड़ो को देखती हूं लगता है जैसे मेरा अंग किसी ने काट दिया हो बहुत ही असहनीय पीढ़ा होती हैं....