### 🌕 माँ के हाथों की खीर और शरद पूर्णिमा
हर वर्ष आती है शरद पूर्णिमा, चाँद वही, वही रात सुहानी, अमृत बरसता है आज भी नभ से, पर सूनी है माँ बिन मेरी कहानी।
याद आती है माँ के हाथों की खीर, वो चूल्हे की आँच, वो दूध की मिठास, खीर को चाँदनी में रखकर कहती थी माँ— “आज अमृत बरसेगा, रखना इसमें विश्वास।”
हम सब बच्चे कितने खुश हो जाते, माँ के इर्द-गिर्द सिमटकर बैठ जाते, उसके हाथों से खीर खाते-खाते, हम दुनिया के सारे सुख पा जाते।
न कोई चाँदी का चम्मच था, न मेवों की कोई खास सजावट, माँ के हाथों का स्पर्श ही काफी था, उस खीर में घुल जाती थी सारी ममता।
आज भी शरद पूर्णिमा आती है, चाँदनी मेरे आँगन में उतर जाती है, मैं भी खीर बनाती हूँ माँ, तेरी तरह, पर हर चम्मच में तेरी कमी रह जाती है।
दूध वही है, चीनी भी वही, वही चावल, वही रात का नूर, फिर भी जाने क्या छूट जाता है, तेरे बिना हर स्वाद लगता है अधूरा।
आज भी खीर बनाकर चाँद के नीचे रखती हूँ, तेरी यादों के दीप मन में जलाती हूँ, तेरे हाथों जैसा स्वाद लाने की कोशिश में, कभी चीनी, कभी आँसू मिलाती हूँ।
माँ, तू कहती थी न, आज अमृत बरसेगा, तो बता, अब वो अमृत कहाँ से लाऊँ? चाँद से माँगूँ, तारों से पूछूँ, या तेरी तस्वीर के आगे सिर झुकाऊँ?
चाँद तो आज भी अमृत बरसाता होगा, आसमान भी अपनी रस्म निभाता होगा, पर माँ, तेरे हाथों का वो जादू कहाँ, जो साधारण खीर को प्रसाद बनाता था।
अब समझ आया, माँ, वो अमृत खीर में नहीं था, वो तेरी ममता थी, तेरे प्यार का सार था, तेरी उँगलियों के स्पर्श में छिपा, मेरे बचपन का सबसे मीठा संसार था।
हर शरद पूर्णिमा पर खीर तो बनेगी, चाँदनी भी मेरे आँगन में सजेगी, पर एक कमी उम्र भर साथ रहेगी— मेरी थाली में खीर तो होगी, माँ, पर उसे प्यार से खिलाने वाली मेरी माँ कहाँ होगी?
आज चाँद को देखकर बस इतना कहती हूँ, अपनी भीगी पलकों से उससे पूछती हूँ— “तू तो हर साल अमृत बरसाता है, मेरी माँ को एक रात के लिए मेरे आँगन में क्यों नहीं ले आता है?” 💔🌕 शकुन्तला अयोध्या फैजाबाद स्वरचित रचना