रात के आँचल में चुपके से,
जब हरसिंगार खिलता है,
लगता है जैसे कोई अपना,
दूर कहीं से मिलता है।
भोर हुई तो फूल झरे,
आँगन फिर से भर आया,
हर पंखुड़ी ने चुपके से,
बीता हुआ कल याद दिलाया।
सफेद पंखुड़ियों में जैसे,
किसी की मासूम हँसी है,
केसरिया डंठल में जैसे,
दिल की कोई अनकही खुशी है।
इसे उठाती हूँ तो लगता है,
कोई हाथ छू गया मेरा,
खुशबू के संग लौट आता है,
वो प्यारा-सा रिश्ता मेरा।
हरसिंगार कुछ कहता नहीं,
बस चुपचाप बिखर जाता है,
शायद जो सच्चा प्रेम हो,
वह शब्दों में कहाँ समाता है।
कल फिर फूल खिलेंगे शायद,
फिर आँगन महक जाएगा,
पर जो आज यादों में है,
वह लौटकर कहाँ आएगा।
इसलिए हर झरे हुए फूल को,
मैं दिल से उठा लेती हूँ,
हरसिंगार की खुशबू में,
अपनों को फिर पा लेती हूँ।
कुछ फूल शाख पर नहीं रहते,
कुछ दिल में बस जाते हैं,
और कुछ रिश्ते चले जाएँ तो,
हरसिंगार बनकर याद आते हैं।
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