अलगाव
अलगाव कभी पति से,
कभी बहनों की हँसी से,
कभी अपने ही आँगन से,
तो कभी सारी दुनिया से।
जीवन की इस लंबी राह में
न जाने कितने मोड़ आते हैं,
कुछ रिश्ते साथ चलते-चलते
अचानक अनजान हो जाते हैं।
जिस घर में हँसी गूँजती थी,
वहीं अब सन्नाटा बोलता है,
भीड़ के बीच खड़ा इंसान भी
अंदर ही अंदर डोलता है।
बहनों की चूड़ियों की खनक,
उनकी नटखट बातें याद आती हैं,
मायके की हर छोटी-सी याद
बरसों बाद भी आँखें भिगो जाती है।
और जब पति से मन का सेतु
बिन कहे ही टूटने लगता है,
तब एक स्त्री का मौन
समंदर से भी गहरा हो जाता है।
वह रोती नहीं हर बार,
बस मुस्कुराना सीख लेती है,
अपने ही टूटे हुए सपनों को
चुपचाप सीना सीख लेती है।
अलगाव केवल दूरी नहीं,
यह आत्मा का मौन विलाप है,
जो सुनाई नहीं देता किसी को,
पर हर धड़कन में उसका संताप है।
फिर भी स्त्री हारती नहीं,
वह राख से फिर जन्म लेती है,
हर बिछड़न के बाद भी
उम्मीद की एक लौ संजो लेती है।
क्योंकि जीवन का सत्य यही है—
हर अँधेरी रात के बाद
एक नया सवेरा जन्म लेता है,
और हर अलगाव के बाद
मन फिर प्रेम करना सीख लेता है।
शकुन्तला अयोध्या फैजाबाद