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Monday, 3 August 2026

माँ की साड़ी

माँ की साड़ी

माँ की साड़ी को जब भी हाथों में उठाती हूँ, ऐसा लगता है जैसे तुम अभी यहीं कहीं हो, माँ... उसमें आज भी तुम्हारी ममता की खुशबू बसती है, और मैं फिर से वही नन्ही बच्ची बन जाती हूँ।

उस साड़ी की हर सिलवट मेरे बचपन की कोई कहानी सुनाती है। कभी मेरे आँसू पोंछने वाला आँचल, आज मेरी आँखों के आँसू चुपचाप सह जाता है।

तुम्हारे जाने के बाद, माँ, घर तो वही है... दीवारें भी वही हैं... लेकिन घर की रौनक, तुम्हारे साथ ही कहीं चली गई।

अब जब भी अलमारी खोलती हूँ, तुम्हारी साड़ी मुझे देखकर जैसे पूछती है— "बेटा, कैसी हो?" और मैं मुस्कुरा भी नहीं पाती, बस फूट-फूटकर रो पड़ती हूँ।

दुनिया कहती है कि समय हर घाव भर देता है, पर माँ... तुम्हारी कमी ऐसा घाव है जो हर सुबह फिर से हरा हो जाता है।

काश! एक बार फिर तुम्हारे आँचल में सिर रखकर जी भरकर रो पाती, एक बार फिर तुम मेरे माथे पर हाथ फेरकर कह देती— "मैं हूँ न, शकुन्तली सब ठीक हो जाएगा।"

लेकिन अब... न वो आँचल है, न वो थपकी, न वो आवाज़।

बस तुम्हारी साड़ी है... जो हर रोज़ मुझे तुम्हारी याद दिलाती है, और हर बार मेरे दिल का एक हिस्सा चुपचाप टूटकर बिखर जाता है।

माँ... अगर सच में कहीं से तुम मुझे देख रही हो, तो आज बस एक बार मेरे सपने में आ जाना... मैं कुछ नहीं माँगूँगी, बस तुम्हें गले लगाकर थोड़ी देर के लिए फिर से जी लेना चाहती हूँ।

शकुन्तला अयोध्या (फैजाबाद )

अस्पताल के चक्कर

अस्पताल के चक्कर

हर सुबह एक नई उम्मीद लेकर,
अस्पताल के चक्कर लगते हैं।
दर्द छिपाकर चेहरे पर,
मुस्कान के पहरे लगते हैं।

लंबी कतारें, थकी निगाहें,
हर दिल में एक आस रहती है।
कोई दवा की राह तकता,
कोई अपनों की साँस गिनता है।

पर्ची, जाँच और दवाइयों के बीच,
दिन कब ढल जाता है।
जीवन का हर अनमोल पल,
इंतज़ार में ही निकल जाता है।

फिर भी मन हार नहीं मानता,
उम्मीद का दीप जलाए रखता है।
विश्वास की डोर थामे इंसान,
हर दर्द से लड़ता रहता है।

ईश्वर से बस यही प्रार्थना है,
हर पीड़ित को स्वास्थ्य का वरदान मिले।
अस्पताल के चक्कर कम हों,
हर घर में खुशियों का स्थान मिले।

शकुन्तला अयोध्या(फैजाबाद) 

Friday, 31 July 2026

अलगाव

अलगाव

अलगाव कभी पति से,
कभी बहनों की हँसी से,
कभी अपने ही आँगन से,
तो कभी सारी दुनिया से।

जीवन की इस लंबी राह में
न जाने कितने मोड़ आते हैं,
कुछ रिश्ते साथ चलते-चलते
अचानक अनजान हो जाते हैं।

जिस घर में हँसी गूँजती थी,
वहीं अब सन्नाटा बोलता है,
भीड़ के बीच खड़ा इंसान भी
अंदर ही अंदर डोलता है।

बहनों की चूड़ियों की खनक,
उनकी नटखट बातें याद आती हैं,
मायके की हर छोटी-सी याद
बरसों बाद भी आँखें भिगो जाती है।

और जब पति से मन का सेतु
बिन कहे ही टूटने लगता है,
तब एक स्त्री का मौन
समंदर से भी गहरा हो जाता है।

वह रोती नहीं हर बार,
बस मुस्कुराना सीख लेती है,
अपने ही टूटे हुए सपनों को
चुपचाप सीना सीख लेती है।

अलगाव केवल दूरी नहीं,
यह आत्मा का मौन विलाप है,
जो सुनाई नहीं देता किसी को,
पर हर धड़कन में उसका संताप है।

फिर भी स्त्री हारती नहीं,
वह राख से फिर जन्म लेती है,
हर बिछड़न के बाद भी
उम्मीद की एक लौ संजो लेती है।

क्योंकि जीवन का सत्य यही है—
हर अँधेरी रात के बाद
एक नया सवेरा जन्म लेता है,
और हर अलगाव के बाद
मन फिर प्रेम करना सीख लेता है।

शकुन्तला अयोध्या फैजाबाद 

Monday, 27 July 2026

बिन छाँव की सड़क

बिन छाँव की सड़क

मैं सड़क हूँ,
कभी मेरे संग चलते थे पेड़ों के साये,
पंछियों के गीत,
और राहगीरों की मुस्कान।

आज धूप मेरे सीने पर
अंगार बनकर उतरती है।
मैं तपती रहती हूँ दिन भर,
मानो किसी ने मेरी हरियाली छीन ली हो।

जो इंसान मुझ पर चलते हैं,
उनके कदम भी जलते हैं।
बूढ़े की साँसें थक जाती हैं,
बच्चे की हँसी कहीं खो जाती है।

न कोई छाँव ठहरती है,
न कोई पत्ता हवा से बातें करता है।
बस धूल उड़ती है,
और गर्म लपटें सफ़र का हिस्सा बन जाती हैं।

पेड़ केवल लकड़ी नहीं होते,
वे राहों की दुआ होते हैं।
वे थके पथिक की राहत,
पक्षियों का घर,
और धरती की धड़कन होते हैं।

मैं सड़क भी पुकारती हूँ—
"मुझे फिर से हरा कर दो,
मेरे किनारों पर जीवन बो दो।"

और इंसान भी कहता है—
"जब तक पेड़ नहीं लौटेंगे,
न सफ़र सुहाना होगा,
न साँसों में ठंडक होगी।"

आओ, एक-एक पौधा लगाएँ,
ताकि फिर किसी दोपहर
सड़क मुस्कुराए,
इंसान चैन की छाँव पाए,
और धरती हमें आशीर्वाद दे।
शकुन्तला अयोध्या (फैजाबाद)

अजीब होते हैं, ये लड़के...



ये लड़के भी बड़े अजीब होते हैं

ये लड़के भी बड़े अजीब होते हैं,
दिल में हजारों ग़म छुपाए,
चेहरे पर मुस्कान लिए
सबको हँसाते रहते हैं।

घर की जिम्मेदारियों का बोझ
चुपचाप अपने कंधों पर उठाते हैं,
और फिर भी सबके सामने
बच्चों-सी नादानियाँ दिखाते हैं।

हर पल लड़ते हैं, चिढ़ाते हैं,
शरारतों से घर महकाते हैं,
लेकिन बहनों की हर छोटी-बड़ी ख्वाहिश
बिना कहे पूरी कर जाते हैं।

ये लड़के भी बड़े अजीब होते हैं...

आँखों में आँसू तो आते हैं,
मगर उन्हें दुनिया से छिपा लेते हैं।
किसी के सामने टूटते नहीं,
बस किसी सुनसान कोने में
चुपके से रो लेते हैं।

पापा की हर अदा की नकल करते हैं,
माँ से हर बात पर बहस भी कर लेते हैं,
फिर भी दुनिया उन्हें
"मम्मा बॉय" कहकर ही बुलाती है।

अपने सपनों को अक्सर
परिवार की खुशियों पर कुर्बान कर देते हैं,
खुद की तकलीफ़ों का ज़िक्र किए बिना
सबकी मुस्कानों की वजह बन जाते हैं।

सच में...
ये लड़के बड़े अजीब होते हैं,
कम कहते हैं, ज़्यादा सहते हैं,
और अपनों की खुशी के लिए
हर दर्द चुपचाप जी लेते हैं।
शकुन्तला अयोध्या ( फैजाबाद)

पेड़ विहीन धरा

मेरा मन बहुत विचलित हो उठता है जब भी मैं कटे हुए पेड़ो को देखती हूं लगता है जैसे मेरा अंग किसी ने काट दिया हो बहुत ही असहनीय पीढ़ा होती हैं....आज मैं सभी एक अनुरोध करना चाहती हूं...... जिस तरह से धरती पेड़ विहीन 🪵होती जा रहीं हैं हम सड़क पर चलते हैं तो पेड़ की छांव को तरस रहे हैं कल को हम पानी के लिए भी ऐसे ही तरसेंगे हमारी आने वाली पीढ़ी को हम क्या सौगात देंगे ये बंजर धरती, मरुस्थल,ये कंक्रीट के जंगल, हमारे बच्चे कितनी देर तक जी पायेंगे आने वाले समय में जब सूर्य की किरणे 60° तापमान से धरती को तपायेंगी तो सोचिए क्या होगा हमारे नाजों से पले बच्चों का जिनको हम इतनी नजुकता से पालते हैं हर जगह AC AC की सुविधा देते हैं.. आखिर कब तक इस झूठे वातावरण में उन्हें हम पालेंगे... जब तक वो इस सच्चाई से रूबरू होंगे तब तक बहुत देर हो चुकी होगी .... इसीलिए आज से क्या अभी से हम कम से कम पांच पेड़ जरूर लगाए...स्त्रियां अगर चाह ले तो हम अपनी बंजर होती धरती को फिर से हरा भरा कर सकती हैं अपने लिए न सही अपने जान से प्यारे बच्चों की जान की हिफाज़त के लिए ही सही हम प्रण करे कि हमें धरती को फिर से जीवनदायनी बनाना है उसे फिर से हरा भरा करना है 🙏🙏🌳🌲🌳🌳🌳🌲🌲🏞️🌨️🌧️

Sunday, 26 July 2026

गौरिया

गौरैया

नन्हे पंखों में धूप समेटे,
आँगन-आँगन गीत सुनाए।
तिनका-तिनका जोड़ बनाकर,
जीवन का विश्वास सिखाए।

न ऊँचे पर्वत माँगे उसने,
न सोने-चाँदी का श्रृंगार।
छोटी-सी चोंच, सरल-सा मन,
फिर भी कितना बड़ा उपकार।

भोर की पहली किरण के संग,
चहक उठे उसका मधुर गान।
सूनी चौखट भी मुस्काती,
भर जाता हर घर-आँगन।

आज न जाने कहाँ छिपी है,
सूने पड़े हैं उसके द्वार।
आओ मिलकर वृक्ष लगाएँ,
रखें जल, दाना हर बार।

फिर लौटेगी वही गौरैया,
फिर गूँजेगा मधुर विहान।
उसके संग ही जीवित होगा,
धरती का मुस्काता सम्मान।
शकुन्तला अयोध्या

माँ की साड़ी

माँ की साड़ी माँ की साड़ी को जब भी हाथों में उठाती हूँ, ऐसा लगता है जैसे तुम अभी यहीं कहीं हो, माँ... उसमें आज भी तुम्हारी ममता...