माँ की साड़ी
माँ की साड़ी को जब भी हाथों में उठाती हूँ, ऐसा लगता है जैसे तुम अभी यहीं कहीं हो, माँ... उसमें आज भी तुम्हारी ममता की खुशबू बसती है, और मैं फिर से वही नन्ही बच्ची बन जाती हूँ।
उस साड़ी की हर सिलवट मेरे बचपन की कोई कहानी सुनाती है। कभी मेरे आँसू पोंछने वाला आँचल, आज मेरी आँखों के आँसू चुपचाप सह जाता है।
तुम्हारे जाने के बाद, माँ, घर तो वही है... दीवारें भी वही हैं... लेकिन घर की रौनक, तुम्हारे साथ ही कहीं चली गई।
अब जब भी अलमारी खोलती हूँ, तुम्हारी साड़ी मुझे देखकर जैसे पूछती है— "बेटा, कैसी हो?" और मैं मुस्कुरा भी नहीं पाती, बस फूट-फूटकर रो पड़ती हूँ।
दुनिया कहती है कि समय हर घाव भर देता है, पर माँ... तुम्हारी कमी ऐसा घाव है जो हर सुबह फिर से हरा हो जाता है।
काश! एक बार फिर तुम्हारे आँचल में सिर रखकर जी भरकर रो पाती, एक बार फिर तुम मेरे माथे पर हाथ फेरकर कह देती— "मैं हूँ न, शकुन्तली सब ठीक हो जाएगा।"
लेकिन अब... न वो आँचल है, न वो थपकी, न वो आवाज़।
बस तुम्हारी साड़ी है... जो हर रोज़ मुझे तुम्हारी याद दिलाती है, और हर बार मेरे दिल का एक हिस्सा चुपचाप टूटकर बिखर जाता है।
माँ... अगर सच में कहीं से तुम मुझे देख रही हो, तो आज बस एक बार मेरे सपने में आ जाना... मैं कुछ नहीं माँगूँगी, बस तुम्हें गले लगाकर थोड़ी देर के लिए फिर से जी लेना चाहती हूँ।
शकुन्तला अयोध्या (फैजाबाद )