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Monday, 27 July 2026

बिन छाँव की सड़क

बिन छाँव की सड़क

मैं सड़क हूँ,
कभी मेरे संग चलते थे पेड़ों के साये,
पंछियों के गीत,
और राहगीरों की मुस्कान।

आज धूप मेरे सीने पर
अंगार बनकर उतरती है।
मैं तपती रहती हूँ दिन भर,
मानो किसी ने मेरी हरियाली छीन ली हो।

जो इंसान मुझ पर चलते हैं,
उनके कदम भी जलते हैं।
बूढ़े की साँसें थक जाती हैं,
बच्चे की हँसी कहीं खो जाती है।

न कोई छाँव ठहरती है,
न कोई पत्ता हवा से बातें करता है।
बस धूल उड़ती है,
और गर्म लपटें सफ़र का हिस्सा बन जाती हैं।

पेड़ केवल लकड़ी नहीं होते,
वे राहों की दुआ होते हैं।
वे थके पथिक की राहत,
पक्षियों का घर,
और धरती की धड़कन होते हैं।

मैं सड़क भी पुकारती हूँ—
"मुझे फिर से हरा कर दो,
मेरे किनारों पर जीवन बो दो।"

और इंसान भी कहता है—
"जब तक पेड़ नहीं लौटेंगे,
न सफ़र सुहाना होगा,
न साँसों में ठंडक होगी।"

आओ, एक-एक पौधा लगाएँ,
ताकि फिर किसी दोपहर
सड़क मुस्कुराए,
इंसान चैन की छाँव पाए,
और धरती हमें आशीर्वाद दे।
शकुन्तला अयोध्या (फैजाबाद)

अजीब होते हैं, ये लड़के...



ये लड़के भी बड़े अजीब होते हैं

ये लड़के भी बड़े अजीब होते हैं,
दिल में हजारों ग़म छुपाए,
चेहरे पर मुस्कान लिए
सबको हँसाते रहते हैं।

घर की जिम्मेदारियों का बोझ
चुपचाप अपने कंधों पर उठाते हैं,
और फिर भी सबके सामने
बच्चों-सी नादानियाँ दिखाते हैं।

हर पल लड़ते हैं, चिढ़ाते हैं,
शरारतों से घर महकाते हैं,
लेकिन बहनों की हर छोटी-बड़ी ख्वाहिश
बिना कहे पूरी कर जाते हैं।

ये लड़के भी बड़े अजीब होते हैं...

आँखों में आँसू तो आते हैं,
मगर उन्हें दुनिया से छिपा लेते हैं।
किसी के सामने टूटते नहीं,
बस किसी सुनसान कोने में
चुपके से रो लेते हैं।

पापा की हर अदा की नकल करते हैं,
माँ से हर बात पर बहस भी कर लेते हैं,
फिर भी दुनिया उन्हें
"मम्मा बॉय" कहकर ही बुलाती है।

अपने सपनों को अक्सर
परिवार की खुशियों पर कुर्बान कर देते हैं,
खुद की तकलीफ़ों का ज़िक्र किए बिना
सबकी मुस्कानों की वजह बन जाते हैं।

सच में...
ये लड़के बड़े अजीब होते हैं,
कम कहते हैं, ज़्यादा सहते हैं,
और अपनों की खुशी के लिए
हर दर्द चुपचाप जी लेते हैं।
शकुन्तला अयोध्या ( फैजाबाद)

पेड़ विहीन धरा

मेरा मन बहुत विचलित हो उठता है जब भी मैं कटे हुए पेड़ो को देखती हूं लगता है जैसे मेरा अंग किसी ने काट दिया हो बहुत ही असहनीय पीढ़ा होती हैं....आज मैं सभी एक अनुरोध करना चाहती हूं...... जिस तरह से धरती पेड़ विहीन 🪵होती जा रहीं हैं हम सड़क पर चलते हैं तो पेड़ की छांव को तरस रहे हैं कल को हम पानी के लिए भी ऐसे ही तरसेंगे हमारी आने वाली पीढ़ी को हम क्या सौगात देंगे ये बंजर धरती, मरुस्थल,ये कंक्रीट के जंगल, हमारे बच्चे कितनी देर तक जी पायेंगे आने वाले समय में जब सूर्य की किरणे 60° तापमान से धरती को तपायेंगी तो सोचिए क्या होगा हमारे नाजों से पले बच्चों का जिनको हम इतनी नजुकता से पालते हैं हर जगह AC AC की सुविधा देते हैं.. आखिर कब तक इस झूठे वातावरण में उन्हें हम पालेंगे... जब तक वो इस सच्चाई से रूबरू होंगे तब तक बहुत देर हो चुकी होगी .... इसीलिए आज से क्या अभी से हम कम से कम पांच पेड़ जरूर लगाए...स्त्रियां अगर चाह ले तो हम अपनी बंजर होती धरती को फिर से हरा भरा कर सकती हैं अपने लिए न सही अपने जान से प्यारे बच्चों की जान की हिफाज़त के लिए ही सही हम प्रण करे कि हमें धरती को फिर से जीवनदायनी बनाना है उसे फिर से हरा भरा करना है 🙏🙏🌳🌲🌳🌳🌳🌲🌲🏞️🌨️🌧️

Sunday, 26 July 2026

गौरिया

गौरैया

नन्हे पंखों में धूप समेटे,
आँगन-आँगन गीत सुनाए।
तिनका-तिनका जोड़ बनाकर,
जीवन का विश्वास सिखाए।

न ऊँचे पर्वत माँगे उसने,
न सोने-चाँदी का श्रृंगार।
छोटी-सी चोंच, सरल-सा मन,
फिर भी कितना बड़ा उपकार।

भोर की पहली किरण के संग,
चहक उठे उसका मधुर गान।
सूनी चौखट भी मुस्काती,
भर जाता हर घर-आँगन।

आज न जाने कहाँ छिपी है,
सूने पड़े हैं उसके द्वार।
आओ मिलकर वृक्ष लगाएँ,
रखें जल, दाना हर बार।

फिर लौटेगी वही गौरैया,
फिर गूँजेगा मधुर विहान।
उसके संग ही जीवित होगा,
धरती का मुस्काता सम्मान।
शकुन्तला अयोध्या

मोगरे की मुस्कान

मोगरे की मुस्कान 🌼

सफ़ेद कलियों की मीठी हँसी,
धरती पर उतरी जैसे चाँदनी बसी।
हर पंखुड़ी में सादगी का श्रृंगार,
महक से भर दे सारा संसार।

हर डाली पर मुस्कुराती बहार,
मन को देती प्रेम का उपहार।
मंद पवन जब इन्हें सहलाती,
हर कली मधुर गीत सुनाती।

टोकरी भर खुशबू का ख़ज़ाना,
प्रकृति ने कितना सुंदर है सजाना।
इन फूलों से सीखो जीवन का सार,
बाँटो प्रेम, महको हर बार।

मोगरे की महक यही कहती है—
"जो स्वयं महकता है, वही संसार को भी महका देता है।" 🌿🤍

सादगी

पीले दुपट्टे की उजली छाँव में,
सादगी ने आज श्रृंगार पहन लिया।
हाथों में महकते फूलों का गुच्छा,
जैसे मन ने सावन को थाम लिया।

चेहरे की शांत, मधुर मुस्कान,
शब्दों से पहले बोल जाती है।
बिन कुछ कहे ही हर मिलने वाले को,
अपनापन घोल जाती है।

न पद का गर्व, न रूप का अभिमान,
बस विनम्रता का सुंदर आभूषण है।
जीवन की हर छोटी-बड़ी उपलब्धि में,
कर्म ही आपका सच्चा भूषण है।

फूलों की यह सुगंध क्षणिक होगी,
पर सद्भाव की महक अमर रहेगी।
जो प्रेम बाँटते हैं मुस्कानों के साथ,
उनकी पहचान सदा अमिट रहेगी।

Friday, 19 September 2025

भटका युवा

आज के युवा... बस उन्हें तो बाइक लड़की और हाथ में आईफोन बस इनकी मंजिल यही तक सीमित है....ये क्या जाने क्रांतिकारी क्या होता हैं 18 साल की छोटी सी उम्र में खुदीराम बोस जैसे युवाओं ने देश के लिए बलिदान दिया.... आज के युवा शर्म आती हैं मुझे इन्हें युवा कहते हुए ये क्या करेंगे देश के लिए जो खुद को ही आजाद नहीं कर पा रहे है इस सोशल मीडिया जैसी बेड़ियों से... मैं बहुत चिंतित हूं इस आने वाली पीढ़ी के भविष्य को लेकर कैसे इन तुच्छ चीजों से इनको बचाया जाय।

बिन छाँव की सड़क

बिन छाँव की सड़क मैं सड़क हूँ, कभी मेरे संग चलते थे पेड़ों के साये, पंछियों के गीत, और राहगीरों की मुस्कान। आज धूप मेरे सीने पर अंगार बनकर उ...