Translate

Sunday, 25 October 2026

माँ के हाथों की खीर और शरद पूर्णिमा

### 🌕 माँ के हाथों की खीर और शरद पूर्णिमा

हर वर्ष आती है शरद पूर्णिमा, चाँद वही, वही रात सुहानी, अमृत बरसता है आज भी नभ से, पर सूनी है माँ बिन मेरी कहानी।

याद आती है माँ के हाथों की खीर, वो चूल्हे की आँच, वो दूध की मिठास, खीर को चाँदनी में रखकर कहती थी माँ— “आज अमृत बरसेगा, रखना इसमें विश्वास।”

हम सब बच्चे कितने खुश हो जाते, माँ के इर्द-गिर्द सिमटकर बैठ जाते, उसके हाथों से खीर खाते-खाते, हम दुनिया के सारे सुख पा जाते।

न कोई चाँदी का चम्मच था, न मेवों की कोई खास सजावट, माँ के हाथों का स्पर्श ही काफी था, उस खीर में घुल जाती थी सारी ममता।

आज भी शरद पूर्णिमा आती है, चाँदनी मेरे आँगन में उतर जाती है, मैं भी खीर बनाती हूँ माँ, तेरी तरह, पर हर चम्मच में तेरी कमी रह जाती है।

दूध वही है, चीनी भी वही, वही चावल, वही रात का नूर, फिर भी जाने क्या छूट जाता है, तेरे बिना हर स्वाद लगता है अधूरा।

आज भी खीर बनाकर चाँद के नीचे रखती हूँ, तेरी यादों के दीप मन में जलाती हूँ, तेरे हाथों जैसा स्वाद लाने की कोशिश में, कभी चीनी, कभी आँसू मिलाती हूँ।

माँ, तू कहती थी न, आज अमृत बरसेगा, तो बता, अब वो अमृत कहाँ से लाऊँ? चाँद से माँगूँ, तारों से पूछूँ, या तेरी तस्वीर के आगे सिर झुकाऊँ?

चाँद तो आज भी अमृत बरसाता होगा, आसमान भी अपनी रस्म निभाता होगा, पर माँ, तेरे हाथों का वो जादू कहाँ, जो साधारण खीर को प्रसाद बनाता था।

अब समझ आया, माँ, वो अमृत खीर में नहीं था, वो तेरी ममता थी, तेरे प्यार का सार था, तेरी उँगलियों के स्पर्श में छिपा, मेरे बचपन का सबसे मीठा संसार था।

हर शरद पूर्णिमा पर खीर तो बनेगी, चाँदनी भी मेरे आँगन में सजेगी, पर एक कमी उम्र भर साथ रहेगी— मेरी थाली में खीर तो होगी, माँ, पर उसे प्यार से खिलाने वाली मेरी माँ कहाँ होगी?

आज चाँद को देखकर बस इतना कहती हूँ, अपनी भीगी पलकों से उससे पूछती हूँ— “तू तो हर साल अमृत बरसाता है, मेरी माँ को एक रात के लिए मेरे आँगन में क्यों नहीं ले आता है?” 💔🌕 शकुन्तला अयोध्या फैजाबाद स्वरचित रचना

Thursday, 8 October 2026

हरसिंगार — कुछ यादें फूल बनकर झरती हैं

हरसिंगार — कुछ यादें फूल बनकर झरती हैं

रात के आँचल में चुपके से,
जब हरसिंगार खिलता है,
लगता है जैसे कोई अपना,
दूर कहीं से मिलता है।

भोर हुई तो फूल झरे,
आँगन फिर से भर आया,
हर पंखुड़ी ने चुपके से,
बीता हुआ कल याद दिलाया।

सफेद पंखुड़ियों में जैसे,
किसी की मासूम हँसी है,
केसरिया डंठल में जैसे,
दिल की कोई अनकही खुशी है।

इसे उठाती हूँ तो लगता है,
कोई हाथ छू गया मेरा,
खुशबू के संग लौट आता है,
वो प्यारा-सा रिश्ता मेरा।

हरसिंगार कुछ कहता नहीं,
बस चुपचाप बिखर जाता है,
शायद जो सच्चा प्रेम हो,
वह शब्दों में कहाँ समाता है।

कल फिर फूल खिलेंगे शायद,
फिर आँगन महक जाएगा,
पर जो आज यादों में है,
वह लौटकर कहाँ आएगा।

इसलिए हर झरे हुए फूल को,
मैं दिल से उठा लेती हूँ,
हरसिंगार की खुशबू में,
अपनों को फिर पा लेती हूँ।

कुछ फूल शाख पर नहीं रहते,
कुछ दिल में बस जाते हैं,
और कुछ रिश्ते चले जाएँ तो,
हरसिंगार बनकर याद आते हैं।

Saturday, 26 September 2026

सुंदर स्त्रियां कौन होती हैं ?

सुंदर स्त्रियाँ कौन होती हैं?

सुंदर स्त्रियाँ कौन होती हैं?
क्या वे, जिनके चेहरे पर चाँद उतरता है,
या वे, जिनकी हँसी से
किसी उदास मन में उजाला भरता है?

सुंदर स्त्रियाँ वे होती हैं—
जो आईने में अपना चेहरा नहीं,
अपनी पहचान तलाशती हैं,
जो भीड़ में खड़ी होकर भी
अपने होने की आवाज़ सुनती हैं।

वे केवल सजती नहीं,
वे रिश्तों को सँवारती हैं,
बिखरे हुए दिनों को
अपनी छोटी-सी हिम्मत से
फिर से जोड़ देती हैं।

कभी वे बारिश में भीगती हुई
बचपन को याद करती हैं,
कभी जिम्मेदारियों के बीच
अपने सपनों को चुपचाप पालती हैं।

उनकी सुंदरता में
थोड़ी शरारत भी होती है,
थोड़ी खामोशी भी,
कुछ अधूरे सपने भी
और बहुत सारी रोशनी भी।

वे हर बार मजबूत दिखें,
यह जरूरी तो नहीं—
कभी उनका रो लेना भी
उनकी ताकत की निशानी होती है।

सुंदर स्त्रियाँ वही हैं
जो अपने लिए भी जीना सीखती हैं,
गिरकर उठती हैं,
हारकर फिर कोशिश करती हैं,
और दूसरों की रोशनी में नहीं,
अपनी चमक में पहचानी जाती हैं।

चेहरा तो उम्र के साथ बदल जाता है,
मगर एक स्त्री का सुंदर मन
समय के साथ और निखरता है—
शायद इसलिए
सुंदर स्त्रियाँ देखी नहीं जातीं,
महसूस की जाती हैं। ❤️
शकुन्तला अयोध्या( फैजाबाद ) स्वरचित स्वाधिकार

Monday, 3 August 2026

माँ की साड़ी

माँ की साड़ी

माँ की साड़ी को जब भी हाथों में उठाती हूँ, ऐसा लगता है जैसे तुम अभी यहीं कहीं हो, माँ... उसमें आज भी तुम्हारी ममता की खुशबू बसती है, और मैं फिर से वही नन्ही बच्ची बन जाती हूँ।

उस साड़ी की हर सिलवट मेरे बचपन की कोई कहानी सुनाती है। कभी मेरे आँसू पोंछने वाला आँचल, आज मेरी आँखों के आँसू चुपचाप सह जाता है।

तुम्हारे जाने के बाद, माँ, घर तो वही है... दीवारें भी वही हैं... लेकिन घर की रौनक, तुम्हारे साथ ही कहीं चली गई।

अब जब भी अलमारी खोलती हूँ, तुम्हारी साड़ी मुझे देखकर जैसे पूछती है— "बेटा, कैसी हो?" और मैं मुस्कुरा भी नहीं पाती, बस फूट-फूटकर रो पड़ती हूँ।

दुनिया कहती है कि समय हर घाव भर देता है, पर माँ... तुम्हारी कमी ऐसा घाव है जो हर सुबह फिर से हरा हो जाता है।

काश! एक बार फिर तुम्हारे आँचल में सिर रखकर जी भरकर रो पाती, एक बार फिर तुम मेरे माथे पर हाथ फेरकर कह देती— "मैं हूँ न, शकुन्तली सब ठीक हो जाएगा।"

लेकिन अब... न वो आँचल है, न वो थपकी, न वो आवाज़।

बस तुम्हारी साड़ी है... जो हर रोज़ मुझे तुम्हारी याद दिलाती है, और हर बार मेरे दिल का एक हिस्सा चुपचाप टूटकर बिखर जाता है।

माँ... अगर सच में कहीं से तुम मुझे देख रही हो, तो आज बस एक बार मेरे सपने में आ जाना... मैं कुछ नहीं माँगूँगी, बस तुम्हें गले लगाकर थोड़ी देर के लिए फिर से जी लेना चाहती हूँ।

शकुन्तला अयोध्या (फैजाबाद )

अस्पताल के चक्कर

अस्पताल के चक्कर

हर सुबह एक नई उम्मीद लेकर,
अस्पताल के चक्कर लगते हैं।
दर्द छिपाकर चेहरे पर,
मुस्कान के पहरे लगते हैं।

लंबी कतारें, थकी निगाहें,
हर दिल में एक आस रहती है।
कोई दवा की राह तकता,
कोई अपनों की साँस गिनता है।

पर्ची, जाँच और दवाइयों के बीच,
दिन कब ढल जाता है।
जीवन का हर अनमोल पल,
इंतज़ार में ही निकल जाता है।

फिर भी मन हार नहीं मानता,
उम्मीद का दीप जलाए रखता है।
विश्वास की डोर थामे इंसान,
हर दर्द से लड़ता रहता है।

ईश्वर से बस यही प्रार्थना है,
हर पीड़ित को स्वास्थ्य का वरदान मिले।
अस्पताल के चक्कर कम हों,
हर घर में खुशियों का स्थान मिले।

शकुन्तला अयोध्या(फैजाबाद) 

Friday, 31 July 2026

अलगाव

अलगाव

अलगाव कभी पति से,
कभी बहनों की हँसी से,
कभी अपने ही आँगन से,
तो कभी सारी दुनिया से।

जीवन की इस लंबी राह में
न जाने कितने मोड़ आते हैं,
कुछ रिश्ते साथ चलते-चलते
अचानक अनजान हो जाते हैं।

जिस घर में हँसी गूँजती थी,
वहीं अब सन्नाटा बोलता है,
भीड़ के बीच खड़ा इंसान भी
अंदर ही अंदर डोलता है।

बहनों की चूड़ियों की खनक,
उनकी नटखट बातें याद आती हैं,
मायके की हर छोटी-सी याद
बरसों बाद भी आँखें भिगो जाती है।

और जब पति से मन का सेतु
बिन कहे ही टूटने लगता है,
तब एक स्त्री का मौन
समंदर से भी गहरा हो जाता है।

वह रोती नहीं हर बार,
बस मुस्कुराना सीख लेती है,
अपने ही टूटे हुए सपनों को
चुपचाप सीना सीख लेती है।

अलगाव केवल दूरी नहीं,
यह आत्मा का मौन विलाप है,
जो सुनाई नहीं देता किसी को,
पर हर धड़कन में उसका संताप है।

फिर भी स्त्री हारती नहीं,
वह राख से फिर जन्म लेती है,
हर बिछड़न के बाद भी
उम्मीद की एक लौ संजो लेती है।

क्योंकि जीवन का सत्य यही है—
हर अँधेरी रात के बाद
एक नया सवेरा जन्म लेता है,
और हर अलगाव के बाद
मन फिर प्रेम करना सीख लेता है।

शकुन्तला अयोध्या फैजाबाद 

Monday, 27 July 2026

बिन छाँव की सड़क

बिन छाँव की सड़क

मैं सड़क हूँ,
कभी मेरे संग चलते थे पेड़ों के साये,
पंछियों के गीत,
और राहगीरों की मुस्कान।

आज धूप मेरे सीने पर
अंगार बनकर उतरती है।
मैं तपती रहती हूँ दिन भर,
मानो किसी ने मेरी हरियाली छीन ली हो।

जो इंसान मुझ पर चलते हैं,
उनके कदम भी जलते हैं।
बूढ़े की साँसें थक जाती हैं,
बच्चे की हँसी कहीं खो जाती है।

न कोई छाँव ठहरती है,
न कोई पत्ता हवा से बातें करता है।
बस धूल उड़ती है,
और गर्म लपटें सफ़र का हिस्सा बन जाती हैं।

पेड़ केवल लकड़ी नहीं होते,
वे राहों की दुआ होते हैं।
वे थके पथिक की राहत,
पक्षियों का घर,
और धरती की धड़कन होते हैं।

मैं सड़क भी पुकारती हूँ—
"मुझे फिर से हरा कर दो,
मेरे किनारों पर जीवन बो दो।"

और इंसान भी कहता है—
"जब तक पेड़ नहीं लौटेंगे,
न सफ़र सुहाना होगा,
न साँसों में ठंडक होगी।"

आओ, एक-एक पौधा लगाएँ,
ताकि फिर किसी दोपहर
सड़क मुस्कुराए,
इंसान चैन की छाँव पाए,
और धरती हमें आशीर्वाद दे।
शकुन्तला अयोध्या (फैजाबाद)

माँ के हाथों की खीर और शरद पूर्णिमा

### 🌕 माँ के हाथों की खीर और शरद पूर्णिमा हर वर्ष आती है शरद पूर्णिमा, चाँद वही, वही रात सुहानी, अमृत बरसता है आज भी नभ से, पर सूनी है माँ ...