दिल की बात
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Saturday, 26 September 2026
सुंदर स्त्रियां कौन होती हैं ?
Monday, 3 August 2026
माँ की साड़ी
माँ की साड़ी
माँ की साड़ी को जब भी हाथों में उठाती हूँ, ऐसा लगता है जैसे तुम अभी यहीं कहीं हो, माँ... उसमें आज भी तुम्हारी ममता की खुशबू बसती है, और मैं फिर से वही नन्ही बच्ची बन जाती हूँ।
उस साड़ी की हर सिलवट मेरे बचपन की कोई कहानी सुनाती है। कभी मेरे आँसू पोंछने वाला आँचल, आज मेरी आँखों के आँसू चुपचाप सह जाता है।
तुम्हारे जाने के बाद, माँ, घर तो वही है... दीवारें भी वही हैं... लेकिन घर की रौनक, तुम्हारे साथ ही कहीं चली गई।
अब जब भी अलमारी खोलती हूँ, तुम्हारी साड़ी मुझे देखकर जैसे पूछती है— "बेटा, कैसी हो?" और मैं मुस्कुरा भी नहीं पाती, बस फूट-फूटकर रो पड़ती हूँ।
दुनिया कहती है कि समय हर घाव भर देता है, पर माँ... तुम्हारी कमी ऐसा घाव है जो हर सुबह फिर से हरा हो जाता है।
काश! एक बार फिर तुम्हारे आँचल में सिर रखकर जी भरकर रो पाती, एक बार फिर तुम मेरे माथे पर हाथ फेरकर कह देती— "मैं हूँ न, शकुन्तली सब ठीक हो जाएगा।"
लेकिन अब... न वो आँचल है, न वो थपकी, न वो आवाज़।
बस तुम्हारी साड़ी है... जो हर रोज़ मुझे तुम्हारी याद दिलाती है, और हर बार मेरे दिल का एक हिस्सा चुपचाप टूटकर बिखर जाता है।
माँ... अगर सच में कहीं से तुम मुझे देख रही हो, तो आज बस एक बार मेरे सपने में आ जाना... मैं कुछ नहीं माँगूँगी, बस तुम्हें गले लगाकर थोड़ी देर के लिए फिर से जी लेना चाहती हूँ।
शकुन्तला अयोध्या (फैजाबाद )
अस्पताल के चक्कर
अस्पताल के चक्कर
हर सुबह एक नई उम्मीद लेकर,
अस्पताल के चक्कर लगते हैं।
दर्द छिपाकर चेहरे पर,
मुस्कान के पहरे लगते हैं।
लंबी कतारें, थकी निगाहें,
हर दिल में एक आस रहती है।
कोई दवा की राह तकता,
कोई अपनों की साँस गिनता है।
पर्ची, जाँच और दवाइयों के बीच,
दिन कब ढल जाता है।
जीवन का हर अनमोल पल,
इंतज़ार में ही निकल जाता है।
फिर भी मन हार नहीं मानता,
उम्मीद का दीप जलाए रखता है।
विश्वास की डोर थामे इंसान,
हर दर्द से लड़ता रहता है।
ईश्वर से बस यही प्रार्थना है,
हर पीड़ित को स्वास्थ्य का वरदान मिले।
अस्पताल के चक्कर कम हों,
हर घर में खुशियों का स्थान मिले।
शकुन्तला अयोध्या(फैजाबाद)
Friday, 31 July 2026
अलगाव
अलगाव
अलगाव कभी पति से,
कभी बहनों की हँसी से,
कभी अपने ही आँगन से,
तो कभी सारी दुनिया से।
जीवन की इस लंबी राह में
न जाने कितने मोड़ आते हैं,
कुछ रिश्ते साथ चलते-चलते
अचानक अनजान हो जाते हैं।
जिस घर में हँसी गूँजती थी,
वहीं अब सन्नाटा बोलता है,
भीड़ के बीच खड़ा इंसान भी
अंदर ही अंदर डोलता है।
बहनों की चूड़ियों की खनक,
उनकी नटखट बातें याद आती हैं,
मायके की हर छोटी-सी याद
बरसों बाद भी आँखें भिगो जाती है।
और जब पति से मन का सेतु
बिन कहे ही टूटने लगता है,
तब एक स्त्री का मौन
समंदर से भी गहरा हो जाता है।
वह रोती नहीं हर बार,
बस मुस्कुराना सीख लेती है,
अपने ही टूटे हुए सपनों को
चुपचाप सीना सीख लेती है।
अलगाव केवल दूरी नहीं,
यह आत्मा का मौन विलाप है,
जो सुनाई नहीं देता किसी को,
पर हर धड़कन में उसका संताप है।
फिर भी स्त्री हारती नहीं,
वह राख से फिर जन्म लेती है,
हर बिछड़न के बाद भी
उम्मीद की एक लौ संजो लेती है।
क्योंकि जीवन का सत्य यही है—
हर अँधेरी रात के बाद
एक नया सवेरा जन्म लेता है,
और हर अलगाव के बाद
मन फिर प्रेम करना सीख लेता है।
शकुन्तला अयोध्या फैजाबाद
Monday, 27 July 2026
बिन छाँव की सड़क
ये लड़के भी न बड़े अजीब होते हैं
पेड़ विहीन धरा
सुंदर स्त्रियां कौन होती हैं ?
सुंदर स्त्रियाँ कौन होती हैं? सुंदर स्त्रियाँ कौन होती हैं? क्या वे, जिनके चेहरे पर चाँद उतरता है, या वे, जिनकी हँसी से किसी उदा...
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खालीपन क्या होता हैं? ये किसी बूढ़ी मां से पूछो जो अपने बच्चों से मिलने की आस लगाए दरवाज़े पर बैठे रास्ता निहारती रहती हैं सोचती है क्या ये ...
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उस चांद से पूछो ? तुम हर दिन घटते बढ़ते क्यों रहते हो ? कभी तो लगता हैं हर दिन बढ़ रहा है प्यार तुम्हारा फिर भ्रम टूटने लगता है ...
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इश्क की आग से दामन को बचाये रहिये ये तो वो खुशबू हैं इसे तन मन में बसाये रखिये उठाते हैं प्यार में जो नफ़रत की दीवारें आप उस दीवार को हमेश...