बिन छाँव की सड़क
मैं सड़क हूँ,
कभी मेरे संग चलते थे पेड़ों के साये,
पंछियों के गीत,
और राहगीरों की मुस्कान।
आज धूप मेरे सीने पर
अंगार बनकर उतरती है।
मैं तपती रहती हूँ दिन भर,
मानो किसी ने मेरी हरियाली छीन ली हो।
जो इंसान मुझ पर चलते हैं,
उनके कदम भी जलते हैं।
बूढ़े की साँसें थक जाती हैं,
बच्चे की हँसी कहीं खो जाती है।
न कोई छाँव ठहरती है,
न कोई पत्ता हवा से बातें करता है।
बस धूल उड़ती है,
और गर्म लपटें सफ़र का हिस्सा बन जाती हैं।
पेड़ केवल लकड़ी नहीं होते,
वे राहों की दुआ होते हैं।
वे थके पथिक की राहत,
पक्षियों का घर,
और धरती की धड़कन होते हैं।
मैं सड़क भी पुकारती हूँ—
"मुझे फिर से हरा कर दो,
मेरे किनारों पर जीवन बो दो।"
और इंसान भी कहता है—
"जब तक पेड़ नहीं लौटेंगे,
न सफ़र सुहाना होगा,
न साँसों में ठंडक होगी।"
आओ, एक-एक पौधा लगाएँ,
ताकि फिर किसी दोपहर
सड़क मुस्कुराए,
इंसान चैन की छाँव पाए,
और धरती हमें आशीर्वाद दे।
शकुन्तला अयोध्या (फैजाबाद)
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