गौरैया
नन्हे पंखों में धूप समेटे,
आँगन-आँगन गीत सुनाए।
तिनका-तिनका जोड़ बनाकर,
जीवन का विश्वास सिखाए।
न ऊँचे पर्वत माँगे उसने,
न सोने-चाँदी का श्रृंगार।
छोटी-सी चोंच, सरल-सा मन,
फिर भी कितना बड़ा उपकार।
भोर की पहली किरण के संग,
चहक उठे उसका मधुर गान।
सूनी चौखट भी मुस्काती,
भर जाता हर घर-आँगन।
आज न जाने कहाँ छिपी है,
सूने पड़े हैं उसके द्वार।
आओ मिलकर वृक्ष लगाएँ,
रखें जल, दाना हर बार।
फिर लौटेगी वही गौरैया,
फिर गूँजेगा मधुर विहान।
उसके संग ही जीवित होगा,
धरती का मुस्काता सम्मान।
शकुन्तला अयोध्या
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