अस्पताल के चक्कर
हर सुबह एक नई उम्मीद लेकर,
अस्पताल के चक्कर लगते हैं।
दर्द छिपाकर चेहरे पर,
मुस्कान के पहरे लगते हैं।
लंबी कतारें, थकी निगाहें,
हर दिल में एक आस रहती है।
कोई दवा की राह तकता,
कोई अपनों की साँस गिनता है।
पर्ची, जाँच और दवाइयों के बीच,
दिन कब ढल जाता है।
जीवन का हर अनमोल पल,
इंतज़ार में ही निकल जाता है।
फिर भी मन हार नहीं मानता,
उम्मीद का दीप जलाए रखता है।
विश्वास की डोर थामे इंसान,
हर दर्द से लड़ता रहता है।
ईश्वर से बस यही प्रार्थना है,
हर पीड़ित को स्वास्थ्य का वरदान मिले।
अस्पताल के चक्कर कम हों,
हर घर में खुशियों का स्थान मिले।
शकुन्तला अयोध्या(फैजाबाद)
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